क्या हैं भैरव भैरवी साधना ?

भैरव भैरवी साधना अत्यंत ही सर्वोच्च श्रेणी की तंत्र साधना है। तंत्र मार्गी स्त्री भैरवी और पुरुष भैरव कहलाता है। भैरवी की साधना करने वाला साधक आलौकिक सिद्धियां प्राप्त करता है।

वह साधक जिसे वज्रोली साधना आती हो वह ही भैरवी साधना कर सकता है। भैरवी साधना में स्त्री मूल तत्व एवं सर्वप्रमुख है क्योंकि भैरवी के रूप में किसी भी योग्य आयु की स्त्री को साधिका का दर्ज़ा दिया जाता है तथा साधक अपनी पूर्ण साधना की प्रकिया उसी स्त्री के माध्यम से ही संचालित करता है।

Sadhak Sadhika
तंत्र मार्गी स्त्री भैरवी और पुरुष भैरव कहलाता है।

भैरवी को तीन तरीके से सिद्ध किया जा सकता है। पहला माँ के रूप में,दूसरा कुमारी या बेटी के रूप में और तीसरा अर्धग्नि या लता भैरवी के रूप में।

भैरवी साधना में भैरव और भैरवी दोनों उच्च कोटि के साधक होने चाहिए। इस साधना में भैरव का पूर्ण ध्यान साधना के सिद्ध होने पर केन्द्रित होता हैं और भैरवी का कार्य इस प्रक्रिया में सहायता देना होता हैं।

साधना के अनेक पड़ाव में भैरव सर्वप्रथम चक्रों का संधान करता है और कुण्डलिनी के जाग्रत होने के बाद शक्ति के संचरण के लिए भैरवी रूप साधिका के साथ संभोगक्रिया करता है।

साधक के मन में काम भावना नही बल्कि सिर्फ साधना की ही भावना होनी चाहिए और इसमें संभोगक्रिया भैरवी रूप साधिका की पूर्ण सहमति और पूर्ण प्रसन्नता से होनी चाहिए नही तो भैरवी साधना सिद्ध नहीं हो पाएँगी,खंडित हो जाएगी।

भैरवी साधना में शक्तियों एवं उर्जाओं का संचरण भैरवी रुपी साधिका के माध्यम से होता है तथा सर्वप्रथम वह शक्ति भैरवी को प्राप्त होती है एवं इसके बाद वह भैरव रुपी साधक को प्राप्त होती है।

यदि साधक के साथ कोई  भैरवी नहीं हैं उसे कृत्रिम साधनों का प्रयोग करना वर्जित है।इस साधना में भैरवी का होना अति आवश्यक है।

शिवशक्ति

भैरव भैरवी साधना की महत्वपूर्ण सावधानियाँ

भैरव भैरवी साधना के दौरान आहार नियम – 

भैरव भैरवी साधना में विजया और मदिरा का प्रयोग किया जाता है। यह उलटी साधना कहलाती है । वामाचार तंत्र साधना में पंचमकार होता हैं मदिरा,मांस,मत्स्य,मुद्रा और मैथुन।

साधक- साधिका की शारीरिक शक्ति को बनाये रखने के लिए और उत्तेजना देने के लिए मांस, मछली, मदिरा का प्रयोग किया जाता है। परन्तु मदिरा एवं मांस का उपयोग आवश्यक नहीं होता है।

सात्विक मार्ग के साधक साधिका शाकाहारी भोजन के माध्यम से शक्ति और उर्जा प्राप्त कर सकते है।

भैरव भैरवी साधना में कामेच्छा –

भैरव भैरवी साधना के समय प्रारंभिक स्थिति में उत्पन्न होने वाली उत्तेजना प्रायः साधना के पश्चात तीव्र कामेच्छा से समाविष्ट होती है। साधना में रति भाव की मनाही नहीं है।

इसमें साधक की काम साधना खंडित नहीं होती परन्तु साधक के लिए यह अति आवश्यक है वह साधना का मूल सार का स्मरण रखते हुए की इसमें साधक की काम साधना खंडित नहीं होती परन्तु साधक के लिए यह अति आवश्यक है वह साधना का मूल सार का स्मरण रखते हुए की साधना काम इच्छा की तृप्ति के लिए नहीं है वरन निरंतर अभ्यास से कामेच्छा से उत्पन्न ऊर्जा को शक्ति में परिवर्तित करना और साधना को सिद्ध करने का प्रयास करना है।

भैरव भैरवी के ग्रहों का मेल –

यदि स्त्री-पुरुष मंगल,बुध,शुक्र एवं चन्द्र प्रधान है तो ही वे भैरव-भैरवी साधना की ओर आकर्षित होंगे। साधना में जिस मंत्र को सिद्ध करना हो भैरवी का चुनाव उसके ईष्ट के अनुसार करें। शत्रु ग्रह के साथी से बचना चाहिए अन्यथा साधना के समय सामंजस्य की कमी एवं मतभेद प्रारंभ हो जाते हैं।    

भैरव भैरवी साधना विधि

भैरवी के स्नान, श्रृंगार, अंग चित्रण आदि के समय कामोत्तेजक होना तो वर्जित नहीं है; लेकीन प्रेम , श्रद्धा एवं विश्वास के प्रमाद में परिवर्तित करना चाहिए। साधना के समय भैरवी देवी होती है।

इसलिए साधनाकाल में कोई भी अनैतिक, कुत्सित , उग्र भाव लाना साधना को खंडित कर देगा एवं साधक का पतन कर देगा।

दूसरे चरण में भैरवी, भैरवी चक्र का निर्माण करती है। सर्वप्रथम साधक साधिका गुरु के निर्देश अनुसार भैरवी चक्र एवं मद पात्र की पूजा करते है। यह पात्र स्वस्तिक भैरवी चक्र आदि से चित्रित एवं आम्र कलशों से सुसज्जित, सुगन्धित मद्द्रव्य से भरा होता है।

पात्र के ऊपर घी का दीपक जलाया जाता है। चक्र की पूजा में पात्र की पूजा भी साथ ही होती है। साधना के उपयोग मटके या पात्र में देवी का वास होता है।

इसके पश्चात भैरवी की पूजा होती है, पर इन सबसे पहले गुरु की पूजा होती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह साधना किसी गुप्त स्थान पर करनी होती हैं।

भैरवी चक्र में भैरवी का नौ दिन नौ प्रकार के रूपों में पूजा की जाती है। भैरवी साधना में जिस मंत्र को सिद्ध करना हो उस ईष्ट के अनुसार होता है। चक्र, पात्र, सज्जा बनी रहती है।

अत्यधिक महत्वपूर्ण भैरव भैरवी साधना की ध्यान रखने वाली बात है कि दिन के समय साधक, साधिका और अन्य को भी साधना स्थल पर ईष्ट देव की सामान्य पूजा करनी है एवं रात्रि में साधना कार्य करें। पूर्ण साधना को गुप्त रखना अति आवश्यक हैं ।  

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